मेरे जीवन में शिक्षा का महत्व।.

मैं जब ५ वर्ष की थी, तब से मैंने अपनी पढ़ाई आरंभ की। मुझे पढ़ना बिलकुल पसंद नहीं था पर अगल-बगल के बच्चों को स्कूल जाते देख, मैं भी स्कूल जाने लगी। कभी स्कूल में अच्छा लगता तो कभी अच्छा नहीं लगता। फिर भी  मेरे पापा-मम्मी डाँट कर स्कूल भेजते क्योंकि सभी को पता है की शिक्षा जीवन की सबसे बड़ी ज़रुरत है। शिक्षा के बिना जीवन अधूरा है।

मैं अभी कुछ समय पहले M.A. की पढ़ाई के बीच में अपने रिसर्च टॉपिक पर काम करने के लिए घाटशीला (झारखंड) गई थी। वहाँ एक स्कूल के दीवार पर शिक्षा के महत्व पर ज़ोर डालते हुए लिखा था, “जन्म दिये हो तो शिक्षा दो”। ऐसे भी देखा जाए तो लड़कियों के लिए शिक्षा प्राप्त करना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के बढ़ते दौर में लड़कियाँ, लड़कों से कंधे से कंधा मिलाकर बढ़ रही हैं और उनकी स्थिति पहले से थोड़ी बेहतर हुई है। अगर लड़कियाँ शिक्षित हो जाएंगी तो वे अपना अच्छा-बुरा सोच सकती हैं और उच्च शिक्षा प्राप्त करके नौकरी कर सकती हैं। अपने पैर पर खड़ी हो सकती हैं। इस तरह उन पर हो रहे अत्याचार को भी वह रोक सकती हैं।

मेरी आधी पढ़ाई गांव के स्कूल में हुई है और आधी हज़ारीबाग में। गांव में अच्छे स्कूल न होने के कारण बचपन से ही मैंने बहुत स्कूल बदले हैं। ऐसे तो मुझे पढ़ने में बिलकुल मन नहीं लगता था फिर भी पढ़ना तो था ही। साल बीतते गये और क्लास आगे बढ़ती गई। मेरे गांव के हिंदी माध्यम स्कूल से शहर के एक इंग्लिश माध्यम स्कूल में दाख़िला हुआ, जहाँ मैं पढ़ने लगी। मुझे इंग्लिश में उस समय बहुत दिक्कत होती थी फिर भी मैं 5th क्लास में जैसे-तैसे पास हो गयी। 6th क्लास और कठिन हो गया और सारे विषय इंग्लिश में पढ़ना पड़ता था। मुझे अच्छे से समझ में तो नहीं आता था फिर भी मैं पढ़ी। फाइनल परीक्षा में मेरे अंक अच्छे नहीं आए जिसके कारण मुझे अगली कक्षा में जाने से रोक दिया गया। मैं इंग्लिश में फेल हो गयी थी।

फिर मेरा स्कूल बदल कर हिंदी माध्यम स्कूल में किया गया जहाँ से मैंने 10th पास किया। १-२ मार्क्स से  मेरा 2nd डिविज़न हो गया और मेरे सारे दोस्त 1st डिविज़न के साथ पास हुए। मुझे घर पर बहुत डाँट पड़ी, बहुत कुछ लोगों से सुनने को भी मिला। अपने ही दोस्तों के बीच, मैं खुश नहीं रहती थी। मेरा 10th क्लास हज़ारीबाग से हुआ। मैं जैसे-तैसे अपने कॉलेज की पढ़ाई पूरा की। B.A. की पढ़ाई करने के बाद मुझे लगा, मैं आगे नहीं पढूँगी। पर आज के समय को देखते हुए लगा कि बिना शिक्षा के ज़िंदगी में कुछ भी नहीं है। तो आगे पढ़ने के लिए मैं अपनी सबसे अच्छी सहेली अंकिता के साथ विश्विद्यालय में दाख़िला कर आई।

हज़ारीबाग में सोशियोलॉजी में M.A. उपलब्ध नहीं था। इस कारण मेरा कोर्स सोशियोलॉजी Hons. से एंथ्रोपोलॉजी में बदला गया। अब मुझे पढ़ाई बहुत अच्छा लगने लगा क्योंकि B.A. करते समय कॉलेज में क्लास ना के बराबर होते थे जिसके कारण भी पढ़ना उतना अच्छा नहीं लगता था। बस समय-समय पर जाकर परीक्षा देने जाती या अन्य कोई काम या जानकारी लेने के लिए। यूनिवर्सिटी में दाख़िला के बाद क्लास नियमित रूप से होते थे और पढ़ाई भी अच्छी होती थी। एंथ्रोपोलॉजी में बहुत कुछ पढ़ने और सीखने  को मिला। इस विषय में प्रैक्टिकल भी है जिसके कारण मुझे पढ़ने में और अच्छा लगने लगा।

देखते-देखते 1st सेमेस्टर का रिजल्ट आया तो पता चला, मैं क्लास में टॉप की हूँ। जीवन में पहली बार बहुत अच्छा लगा की मैं भी कुछ कर सकती हूँ, कुछ बन सकती हूँ। पहले मेरे जीवन में कोई ध्येय नहीं था पर आज मैं सोचती हूँ कि मैं पीएचडी करुँगी और अपने मम्मी-पापा को अपने ऊपर गर्व महसूस कराऊंगी।

मेरे घर वाले, मेरे और मेरे छोटे भाई के पढ़ाई के लिए अपने गांव के घर को छोड़ कर हज़ारीबाग आ गये क्योंकि गांव में स्कूल अच्छा नहीं था और ना पापा का कोई कारोबार था। वे खेती करते थे। खेती से उतनी अच्छी कमाई नहीं होती थी कि वे हम लोग को बाहर भेज कर पढ़ा सकें। मेरे पापा हज़ारीबाग में जाँच घर खोले हैं, मेरे मामा जी के मदद से। यहाँ मेरे नानी के घर के सारे लोग और मौसी रहती हैं जिनके मदद से हम लोग यहाँ आये। कुछ दिन हम लोग मौसी के घर पर रहे फिर किराये पर घर लेकर रहने लगे।

मेरे पापा-मम्मी को हम लोग के लिए गलत बात को भी सुनकर चुप-चाप रहना पड़ता है क्योंकि हम लोग का घर मामा जी के मदद से ही चलता है। मेरे पापा, मेरे मामा से काफी उम्र में बड़े हैं, फिर भी उनका आदर वहाँ पर नहीं होता है। कभी-कभी सबके सामने मामा जी बहुत चिल्लाकर बोल देते हैं, फिर भी पापा हम लोग के कारण चुप रहते हैं। मेरे पापा ज़्यादा पढ़े नहीं हैं और उनकी उम्र भी हो गयी है। पापा को डर लगता है,अगर उनके बात पर पापा कुछ बोल दिये तो वे लोग हम लोगों का दुकान खाली करवा देंगे। मुझे कभी-कभी बहुत बुरा लगता है, गुस्सा भी बहुत आता है। फिर भी मैं कुछ नहीं कर पाती।

मेरे रिश्तेदारों को भी लगता था कि मैं कुछ नहीं कर सकती। मुझे अपने जीवन में ज़रूर ही कुछ करना है और उन सबको दिखाना है कि, मेहनत कर के कुछ भी पा सकते हैं। मैं अब मेहनत भी कर रही हूँ। अब मेरे परिवार को भी लगता है, मैं कुछ बन सकती हूँ। ऐसे तो मेरे परिवार में सारी लड़कियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त की हैं, पर कोई नियमित कोर्स नहीं की हैं। सब घर बैठ कर, परीक्षा देकर डिग्री ली हैं। मैं अपने परिवार में पहली हूँ जो नियमित क्लास करके पढ़ रही हूँ और बाहर जाकर रिसर्च की। ऐसे मेरी मौसी की बेटियां पढ़ी हैं क्योंकि वे लोग बचपन से ही शहर में रहती थी। वे लोग आज नौकरी भी कर रहीं हैं। पर मेरे दादी के घर में मैं पहली लड़की हूँ जो उच्च शिक्षा, नियमित क्लास करके प्राप्त कर रही है।

Note: 2018 में ब्रेकथ्रू ने हज़ारीबाग और लखनऊ में सोशल मीडिया स्किल्स पर वर्कशॉप्स आयोजित किये थे। इन वर्कशॉप्स में एक वर्कशॉप ब्लॉग लेखन पर केंद्रित था। यह ब्लॉग पोस्ट इस वर्कशॉप का परिणाम है।   

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