पुरूष को मर्द बनाने वाला समाजीकरण.

सामाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मनुष्य समाज के अलग-अलग व्यवहार, रीति-रिवाज़, गतिविधियाँ इत्यादि सीखता है। यही समाजीकरण महिलाओं को औरतें और पुरुषों को मर्द बनाता है। यह ही नही इस व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए समाज दंड और प्रोत्साहन की प्रणाली का उपयोग करता है ताकि व्यवस्था को कोई तोड़ ना सके। जब जब कोई पुरुष और महिला इस व्यवस्था के अनुरूप कार्य करता है तो उसे “अच्छी औरत”  और “असली मर्द” कह कर प्रोत्साहित किया जाता है। लेकिन इसके विपरीत अगर कोई इस व्यवस्था के अनुरूप नही चलते हैं तो उन्हें “गंदी औरत” और नामर्द कह कर दंडित किया जाता रहा है।

अगर हम एक पुरुष के समाजीकरण पर रोशनी डाले तो हम साफ साफ इस व्यवस्था को समझ सकते हैं। बचपन से ही समाज एक पुरुष को यह सिखाना शुरू कर देता है कि एक पुरुष रो नही सकता। रोने को हमेशा कमज़ोरी या कमी से जोड़कर देखा जाता है। हर रूप और पहलू से मज़बूत और ताक़तवर होने की ऊँची उम्मीदें समाज पुरुषों से लगाता है। हमेशा एक पुरुष से यह उम्मीद रखी जाती है कि वो ऐसी भावनाओं को नियंत्रण में रखेगा जो उसे किसी भी रूप में कमजोर या असहाय दिखा सकती हैं। इसके उलट हिंसा और गुस्से को प्रदर्शित करने की कोई मनाई नही है। इसलिए पुरुष अपनी भावनाओं को गुस्से और हिंसा के पर्दों के पीछे रखते हुए, ऐसे नकाब पहन लेते हैं जिससे वो मजबूत नज़र आए। चाहे कितनी ही तकलीफ़ क्यों ना हो, एक पुरूष के लिए रोना और दर्द होने के अहसास को झलकाना सामाजिक रूप से वर्जित है। 

ऐसे ही, एक पुरूष से सामाजिक अपेक्षा है कि वो अपने परिवार का पालन पोषण करेगा। अगर कोई पुरुष ऐसा नही करता है तो उसे नामर्द समझा जाता है। यह भी एक वजह है पुरुषों में रोज़गार ना मिलने पर जो तनाव होता है। शायद यही वजह हो सकती है कि पुरुष ऐसे कार्य करने के लिए भी तैयार हो जाते हैं जिसमे जोख़िम शामिल है। पुरुष तनावपूर्ण माहौल से निकलने में दूसरों की मदद लेने में असहज महसूस करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वो मानसिक रूप से मज़बूत हैं और अपनी समस्याओं और तनाव को खुद दूर करने की कोशिश करते हैं। जब वो ऐसा करने में असफल हो जाते है तो यह ख़ुदकुशी या अपने आप को नुकसान पहुँचाने का रूप ले लेता है।

मर्दानगी के अच्छे मानकों पर खरा उतरने का तनाव पुरुषों को हिंसा, नफ़रत और खुद को नुकसान पहुँचाने की दिशा में ले जा रहा है। इन तनावों का असर हम घरों और सड़कों पर हिंसा के रूप में देखते हैं। फिर चाहे किसी महिला के साथ रिजेक्शन की वजह से किया गया एसिड अटैक हो या फिर भीड़ में मिलकर किसी अन्य इंसान की जान लेना हो। लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि पुरूषों को मर्द बनाने के समाजीकरण में कोई बदलाव के बारे में नही सोचता।

पुरुषों के सामाजिकरण में ना घरों में, ना स्कूलों और ना कार्य स्थलों पर ऐसा कोई  सेफ स्पेस नही है जहां पर पुरूष अपनी भावनाओं, दर्द, डर, नाकामियों और अन्य कमियों के बारे में खुलकर चर्चा कर सकें। यहाँ तक कि जब कोई मानसिक तनाव से गुज़र रहा होता है तो मदद तो दूर की बात है, इस बारे में बात करना भी कलंक माना जाता है। बहुत ज़रूरी है कि हम पुरुषों के समजिकरण पर फिर से विचार करें ताकि पुरुष मानसिक स्वास्थ्य, डर, ख़ामियों औऱ रिजेक्शन पर खुलकर चर्चा कर सकें और अपने आस पास नफ़रत और हिंसा  को नहीं बल्कि प्यार और करुणा का माहौल बना सकें। 

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