क्यों कुछ नहीं बोली छवि दी?.

वो कहते हैं ना, किसी इंसान के जीवन में हुई कोई एक घटना उसके पूरे जीवन और उसके सोच को बदल कर रख देता है। यह बदलाव नकारात्मक भी हो सकता है और सकारात्मक भी। ऐसी ही एक घटना हमारे साथ भी हुई, जिसने मेरे सोचने के तरीके को और मेरे जीवन को बिलकुल बदल दिया।

यह बात है उस समय की जब मैं नवीं कक्षा में थी। मेरी बड़ी बहन और मेरे ताऊ जी की लड़की यानि की मेरी चचेरी बहन बारहवीं कक्षा की परीक्षा उसी साल दी थीं। जैसा की सबके साथ होता है परीक्षाफल का इंतज़ार और घरवालों की हमसे उम्मीदें। बस कुछ इस तरह हम तीनों बहनें अपनी गर्मी की छुट्टियाँ मना रहे थे।

मेरी चचेरी बहन, उनका नाम छवि था और मेरी बड़ी बहन का नाम प्रियंका। छवि दीदी हम दोनों को अपनी सारी बातें बताया करती थी। तीनों बहनों में, मैं ठहरी सबसे छोटी तो पढ़ाई-लिखाई से लेकर घर के काम तक, कभी किसी चीज़ की ज़्यादा फ़िक्र ही नहीं हुई। आख़िर दो बड़ी बहनें जो थीं।

मुझे बचपन से ही पढ़ाई में रुचि नहीं थी, बस मम्मी-पापा के डर से इतना पढ़ लेती थी कि पास हो जाऊँ। छवि दी हमेशा मुझे समझाती थी कि पढ़ाई पर थोड़ा ध्यान दो, पापा बहुत मेहनत से हम लोगों को पढ़ा रहे हैं। लेकिन हमेशा मेरा उनको एक ही जवाब होता था, “दी, आप हो ना! आपकी नौकरी लग जाएगी फिर पापा को मेहनत भी कम करनी पड़ेगी और मेरी ज़रूरतें पूरी करना भी तो आपकी ज़िम्मेदारी है।”

मेरी छवि दी का सपना था एयर हॉस्टेस बनने का और उसके लिए वह पूरी मेहनत करने को तैयार थी। घरवाले भी बोलते थे कि चलो सबसे हट कर यह कुछ ऐसा करेगी, जिसे अपने ख़ानदान में किसी ने नहीं किया। लेकिन किसे पता था कि किस्मत को तो कुछ और ही मंज़ूर था। हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि शादी से पहले हम अपनी छवि दी से दूर हो जाएँगे।

छवि दी ने कभी हमें इस बात की भनक तक नहीं लगने दी कि वह अंदर ही अंदर कितना परेशान हैं। उनके दोस्त का एक दोस्त, सात महीने से उन्हें परेशान कर रहा था और उसके परेशान करने की हद यहाँ तक बढ़ चुकी थी कि घर वालों को मारने और किसी को न बताने की धमकियाँ देने लगा था।

बस इन्हीं सब के चलते वह अंदर ही अंदर एक दम घुट सी गयी थी और बिना हम सब को बताये, एक दिन रात में उन्होंने आत्महत्या कर लिया। सुबह, जब मम्मी ने जगाकर बताया, हमें तो विश्वास नहीं हो रहा था। लेकिन सच्चाई को कौन बदल सकता है। हम सब को अकेला छोड़कर उन्होंने इस दुनियाँ को अलविदा कह दिया था।  

उनका इस तरह छोड़कर जाना, हमारे लिए भूलना बहुत मुश्किल था, लेकिन फिर बस उनकी वही बातें याद आयी कि पैसे कमा कर पापा की मदद करना है। उस समय ही हमने और हमारी प्रियंका दी ने सोच लिया था कि उनके जो भी सपने थे, जो भी उनकी हमसे उम्मीदें थी, वो अब हम पूरी कोशिश करेंगे पूरा करने की। मैं और मेरी दी आज जितनी भी मेहनत कर रहे हैं, वह बस उनकी उम्मीदों को पूरा करने के लिए ही कर रहे हैं। 

Note: 2018 में ब्रेकथ्रू ने हज़ारीबाग और लखनऊ में सोशल मीडिया स्किल्स पर वर्कशॉप्स आयोजित किये थे। इन वर्कशॉप्स में एक वर्कशॉप ब्लॉग लेखन पर केंद्रित था। यह ब्लॉग पोस्ट इस वर्कशॉप का परिणाम है।  

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