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क्या सिर्फ उच्च जाति के लोगो को सपने देखने का हक़ है?.

यह घटना हाल ही में हुई और यह इस तथाकथित सभ्य समाज में हुई। आप उस घटना के बारे में शायद जानते हैं और मैं आपको सिर्फ फिर से याद दिला रहा हूँ। मैं सिर्फ एक घटना के बारे में बता रहा हूँ, लेकिन कई घटनाएँ तो मीडिया तक पहुँचती भी नहीं हैं। मैं इस पर लिख रहा हूँ क्योंकि यह घटना किसी के लिए एक भयानक घटना तथा दर्दनाक अनुभव था। मैं कहूँगा कि यह आतंकवाद फैलाने वाली घटना थी।

आतंक न केवल परिवार में फैल गया बल्कि यह उस क्षेत्र के पूरे मेघवाल समुदाय में फैल गया था। यह एक बेटी के सपने की हत्या थी। मैं नीतू मेघवाल के सपने के बारे में बात कर रहा हूँ जो टूट गया था क्योंकि मुख्यमंत्री और अन्य बड़े राजनेता भी उसके सपने को पूरा करने में सक्षम नहीं थे। वह चाहती थी कि उसका दूल्हा शादी करने के लिए घोड़े पर चढ़के आये।

उस बेटी की ग़लती क्या थी? उसे अपने सपने को पूरा करने की अनुमति क्यों नहीं थी? क्या मेघवाल परिवार में पैदा होना पाप है?

हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशित करता हैं, “नीतू की इच्छा ने अपने मूल गांव खिम्ड़ा में, सोमसर रेलवे स्टेशन के पास, जयपुर से 350 किमी दूर, तनाव पैदा किया”। मैं बहुत सरल सवाल पूछ रहा हूँ कि क्यों लोग तनाव में थे? नीतू की इस इच्छा से किसी का क्या बिगड़ा था? उत्पीड़कों की मानवता कहां थी? जब एक दलित दूसरे धर्म में परिवर्तित हो जाता है तो लोग उसे बहुत बुरी तरह से प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन कहाँ थे वे धार्मिक बल जब मेघवाल की बेटी की इच्छा, शक्तिशाली ताक़तों ने कुचल दी थी?

समाचार बताते हैं कि, “शादी से एक दिन पहले, पुलिस ने परिवार से एक लिखित अंडरटेकिंग लिया कि वे नीतू के दूल्हे को घोड़ी की सवारी करवाना नहीं चाहते हैं –निवासियों में माना जाता है कि गांव की ऊंची जाति के पारंपरिक विशेषाधिकार हैं, जिनके दूल्हे ज्यादातर शादी स्थल के लिए घोड़े की पीठ पर दुल्हन के घर आते हैं”।

आइए हम इस बात को स्वीकार करने के लिए कठिन प्रयास करते हैं कि परिवार नहीं चाहता था कि नीतू के दूल्हे को घोड़े की पीठ पर आना चाहिए। फिर भी एक सवाल उठता है, अगर परिवार ऐसा नहीं चाहता होता, तो वह पहले कैसे मांग रख रहे थे? क्या आपको लगता है कि लोग धमकियों और अपमान के रहस्यों के बारे में नहीं जानते हैं?

शादी कितनी बहुमूल्य होती है, लेकिन उन अहंकारी और शक्तिशाली ताकतों ने उस अनमोल क्षण के महत्व को कहाँ समझा! इन शक्तियों ने अपनी पूरी ताकत के साथ कोशिश की कि वे अपने मिशन में सफल हो। एक लड़की के सपने को कुचलने के लिए उन शक्तियों को बधाई!

कहाँ हैं वे धार्मिक शक्तियां जो समानता, न्याय और भाईचारे के लिए बोलते हैं? कैंची सी ज़बान के नेता लोग कहां थे? यहाँ समानता, न्याय और भाईचारे का अच्छा ख्याल रखा गया था!

दलित लोग नीतू के आभारी हैं कि वह उनके संघर्ष का प्रतीक और आवाज़ बन गई। कम से कम उसने अपनी इच्छा रखी और कोशिश की। उसको सलाम किया जाना चाहिए। कम से कम उसने इसके लिए प्रयास किया और इस मामले को मीडिया में उजागर किया ताकि दुनिया के लोग इन लोगों के बेरहमी और एकजुट रवैये को जानने पाए।

इन लोगों के बीच में से कुछ लोग नीतू बहन के साथ मिलते, तो निश्चित रूप से हमें यह विश्वास होता कि वे दलितों के खिलाफ एकजुट नहीं है और वे नीतू बहन की ओर से लड़ रहे थे। दलितों के लिए इससे अधिक अकेलापन और दुख क्या हो सकता है! भगवान इन अत्याचारी लोगों को समझ दे।

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