September 15, 2014

बेटी उत्सव

हरियाणवी समाज में बच्चों के जन्म को एक जश्न लायक समारोह के तौर पर समझा जाता है खासतौर पर लड़कों के जन्म को बहुत ही जश्न के रूप में मनाया जाता है. जैसे ही किसी घर में लड़के की किलकारियां गूंजती हैं वैसे ही थालियाँ बजाई जाने लगती हैं मानो...

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Sanjay

Kumar


हरियाणवी समाज में बच्चों के जन्म को एक जश्न लायक समारोह के तौर पर समझा जाता है खासतौर पर लड़कों के जन्म को बहुत ही जश्न के रूप में मनाया जाता है. जैसे ही किसी घर में लड़के की किलकारियां गूंजती हैं वैसे ही थालियाँ बजाई जाने लगती हैं मानो उसके जन्म का आगाज किया जा रहा हो. नीम की टहनियां टागी जाती हैं और लड्डू बांटे जाते हैं. छठी, कुआँ पूजन आदि परम्पराएं सामाजिक तौर पर पर खूब जोर-शोर से की जाती हैं. जन्मे बच्चे के नानके (नाना-मामा) के घर से काफी धूमधाम से पीलिया आता है.लेकिन वहीँ लड़की के जन्म पर कोई जश्न नहीं मनाया जाता. केवल रस्मी औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं. बल्कि अगर किसी के घर में दूसरी या तीसरी लड़की पैदा हो जाए तो रोना पीटना मच जाता है. और यह हरियाणा में लड़कियों के नामों में भी झलकता है जैसे भतेरी, रामभतेरी ( मतलब राम अब तो बस करो बहुत हो गई ), अंतिम, आखिरी आदि.

अगर समाज में कोई लड़की के जन्म को भी खुशी के मौके के तौर पर मनाना चाहे तो उसे भी कई विरोधों का सामना करना पड़ता है.अपनी बेटी पुष्टि (खुशी) के जन्मोत्सव के मौके पर मुझे भी ऐसे ही अनुभवों से दो-चार होना पड़ा.एक जागरूक इंसान व ब्रेकथ्रू में इस मुद्दे पर काम करते हुए हम जिस बात का प्रचार करते हैं, उसे अमल में लाना व करके दिखाना वाकई एक अद्भुत अनुभव था. जब मेरे घर बेटी का आगमन हुआ तो अब केवल उपदेश या प्रचार का मौका नहीं बल्कि समाज में उदाहरण पेश करने का मौका था. लेकिन जब मैंने अपनी माँ से पुष्टि के लिए गीत गाये जाने को कहा तो उनका जवाब था कि लड़की के जन्म पर कोई औरत गीत गाने के लिए नहीं आएगी. लेकिन जब सबको बुलाया गया तो तमाम औरते आई लेकिन फिर वही लड़कों के गीत क्योंकि समाज में लड़कियों के लिए गीत बनाये ही नहीं गाये हैं.ऐसे ही नीम की डाली टांगने के लिए बोलने पर जवाब मिला कि ये तो लड़कों के जन्म पर टांगते हैं. अगर टहनी टांगोगे तो लड़के का जन्म समझकर किन्नर आ जायेंगे. खैर हमने बड़े तौर पर पुष्टि का जन्मोत्सव मनाने का फैसला किया. कुछ लोगों ने समझा कि लड़के की सरकारी नौकरी लगी है तो कुछ ने अंदाजा लगाया कि घर में शादी है तभी पार्टी कर रहे हैं.

31 अगस्त को बड़े पैमाने पर पुष्टि का जन्मोत्सव “बेटी उत्सव” के तौर पर धूमधाम से मनाया गया और समाज में बेटियों का महत्व समझाने के लिए थाली बजाकर एक नाटक का मंचन किया गया. इस नुक्कड़ नाटक “सोच कर देखो”को सैंकडों लोगों ने देखा और और नाटक के बाद काफी सवाल जवाब भी किये गये. दिल्ली, कुरुक्षेत्र, यमुना नगर व पानीपत से आये काफी साथियों ने प्रोग्राम में शिरकत की और अपनी अपनी जगह ये सन्देश लेकर गए.

लेकिन एक सवाल जो अक्सर हमारे सामने आता है और यहाँ भी आया कि बेटियों को कैसे एक सुरक्षित माहौल दे, आज समाज में इतनी ज्यादा असुरक्षा है. एक बेटी का बाप होने के नाते मैं भी चाहूँगा कि मेरी बेटी को ऐसा माहौल मिले कि वो अच्छे से पढ़-लिख पाए, बेख़ौफ़ होकर समाज में घूम फिर सके, नौकरी कर सके व आजादी से जीवन जी सके. इसके लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा बेटियों को जन्म लेने का मौका मिले और उन्हें पढ़ने, घूमने-फिरने व सामाजिक दायरे में आने के अवसर मिले क्योंकि जितनी ज्यादा लड़कियां व महिलाएं बाहर सार्वजनिक स्थलों पर दिखेंगी उतना ही समाज उनके लिए सुरक्षित बनेगा.

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