FYI, हिंदी 31st December, 2018

यह #MeToo आंदोलन क्या है?.

जब एक महिला घर से निकल कर समाज में कदम रखती है और काम करना चाहती है तो उसे कार्यस्थल पर कई प्रकार की मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। यौन उत्पीड़न उसमे से एक है। हमारे समाज में महिलाओं को नीचे निगाहों से देखा जाता है और उन्हें सिर्फ घर में चूल्हा चौका संभालने के लायक समझा जाता है। ऐसे में जब कोई भी महिला घर की चार दीवारों से निकल कर काम करना चाहती है तो उन्हें यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है।  महिलाएं अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामलों को खुलकर नहीं बोल पाती।

इन मामलों को खुलकर सामने लाने में सोशल मीडिया ने वर्तमान में बहुत अहम भूमिका निभाई है। कई महिलाओं ने अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामलों को सोशल मीडिया पर खुलकर बताया है। सोशल मीडिया पर इन मामलों को खुलकर बताने के लिए एक आंदोलन की शुरुआत की गई है जिसे हम सब ने #MeToo यानी ‘ मैं भी’ या ‘मेरे साथ भी ‘आंदोलन के नाम से जाना है।

क्या है #MeToo आंदोलन?

#MeToo आंदोलन का हिस्सा बन कई औरतों ने अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के बारे में दुसरो के साथ सोशल मीडिया पर साझा किया है। इस आंदोलन के चलते कई महिलाओं ने अपने कार्यस्थल पर अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामलों को दुनिया के सामने रखा है तथा अपने साथ कई दशकों पहले हुए यौन उत्पीड़न की घटनाओं को भी सामने रखा है। महिलाओं ने बताया कि किस तरह उन्हें प्रभावी या शारीरिक ताकत से मजबूर करके उनका यौन उत्पीड़न किया गया। कभी वो डर कर चुप हो गयीं कभी उन्होंने बदनामी के डर से मुंह नहीं खोला। मगर आज जब उनके पास सोशल मीडिया पर आवाज़ उठाने का मौका है तो वह अपनी कहानियों के साथ सामने आ रही हैं। वह महिलाएं ज़्यादा सामने आ रही हैं जिनके साथ उनके कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न हुआ है।

इन मामलों को खुलकर सामने लाने में सोशल मीडिया ने वर्तमान में बहुत अहम भूमिका निभाई है।

कब शुरू हुआ #MeToo आंदोलन?

#MeToo आंदोलन की शुरुआत सबसे पहले 2006 में हुई थी। तराना बर्क, अफ्रीकी-अमेरिकी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट ने सबसे पहले 2006 में ‘माय स्पेस’ नाम के सोशल नेटवर्क पर #MeToo का इस्तेमाल किया था। तराना बर्क खुद एक यौन शोषण की सरवाईवर हैं। उनके इन दो शब्दों ने एक आंदोलन का रूप ले लिया जिसमें यौन शोषण सरवाईवर्स को एहसास दिलाया कि वह अकेली नहीं है। 16 अक्टूबर 2017 में अमेरिकी एक्ट्रेस (एलिसा मिलानो) ने यौन उत्पीड़न की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने #MeToo का इस्तेमाल किया। एलिसा के इस ट्वीट का असर यह हुआ कि दिन खत्म होते-होते #MeToo के साथ दो लाख से ज़्यादा ट्वीट किए गए और 17 अक्टूबर तक पांच लाख से ज्यादा ट्वीट हो चुके थे। फेसबुक पर पहले 24 घंटे में 47 लाख से ज़्यादा लोगों ने अपनी 1 करोड़ 20 लाख पोस्ट में #MeToo का इस्तेमाल किया जिनमें 45 % लोग अमेरिकी थे।

भारत में #MeToo आंदोलन

अक्टूबर 2017 में जब अमेरिका में #MeToo आंदोलन चला तो इसका असर भारत में भी हुआ। कई महिलाओं ने बताया कि कैसे उनके साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न किया गया। लेकिन भारत में यह आंदोलन 25 सितंबर 2018 में गतिशील हुआ जब बॉलीवुड अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने अभिनेता नाना पाटेकर के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया तथा अपनी आपबीती बताई। तनुश्री के बाद भारत के टीवी और फिल्म इंडस्ट्री की कई महिलाएं आगे आयी और उन्होंने एक से एक दिग्गज कलाकारों का नाम लेते हुए बताया कि काम देने के बहाने उनका यौन उत्पीड़न किया गया था।  इस क्रम में (एक्टर) आलोक नाथ, पियूष मिश्रा,रजत कपूर, रोहित रॉय,( डायरेक्टर) विकास बहल, सुभाष घई, साजिद खान, सुभाष कपूर, लव रंजन, विवेक अग्निहोत्री और भी कई नाम सामने आए।

फेसबुक पर पहले 24 घंटे में 47 लाख से ज़्यादा लोगों ने अपनी 1 करोड़ 20 लाख पोस्ट में #MeToo का इस्तेमाल किया जिनमें 45 % लोग अमेरिकी थे।

निष्कर्ष

#MeToo आंदोलन उन महिलाओं के लिए एक बहुत ही बड़ा अवसर है जो अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के बारे में किसी न किसी वजह से नहीं बोल पायी और ना ही कोई कदम उठा पायी। यह आंदोलन महिलाओं को अपनी बात खुलकर सोशल मीडिया के ज़रिये दुनिया के सामने लाने का एक बड़ा अवसर प्रदान करती है। साथ ही सोशल मीडिया ने इस आंदोलन या इस प्रकार के आंदोलनों को लोगों तक पहुंचाने तथा उन्हें जागरुक करने में बड़ी भूमिका निभाई है।


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