In Focus 10th February, 2015
हरयाणा में किये गए वाल्कथॉन से पहले का अनुभव.

कार्य हमेशा मनुष्य को कुछ अद्भुत अनुभव देता है ऐसा ही कुछ अद्भुत अनुभव मेरे साथ घटा!

ब्रेकथ्रू में पिछले दस महीनो से काम करते हैं जिसमे हमने schools इंटरवेंशन , trainings, गॉंव में दिखाए गए नुक्कड़ नाटक जो लोगो को महिला अधिकारों के प्रति जागरूक करने पर विभिन्न तरह के कार्यक्रमों को मैं हिस्सा रहा . ऐसा ही एक कार्यक्रम 31 जनवरी को गनौर में हुआ जिसमे मुझे एक अलग ही अनुभव रहा जिसको मैं ब्रेकथ्रू के साथ साँझा कर रहा हूँ!

एक बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिये हमेशा उसमे चुनौतियाँ भी बड़ी होती है जैसा की हमारे साथ हुआ। गनौर में हम महिलाओं के अधिकारों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये एक प्रोग्राम का आयोजन करने जा रहे थे जिसमे हजोरों लड़कियां शहर में पैदल मार्च करने वाली थी । इससे पूर्व हमे इस प्रोग्राम को सफल बनाने के लिये जितने भरसक प्रयास किये वो वह वास्तव में अनुभव का एक पक्ष है .एस . डी .एम् ऑफिस , एस .पी ., डी.एस.पी ऑफिस में जाना पड़ा और शहर में साफ सफाई के लिये नगरपालिका ऑफिस जाकर सारा काम बहुत ही भाग्दौर और जिम्मेदारी का कम था । सड़कों पर झंडे लगवाने से लेकर ब्रेकथ्रू के बैनर लगवाने तक यह सभी कार्य वास्तव में बहुत कठिन थे ! चाहे वो permission लैटर के लिये D.C. ऑफिस के चक्कर काटने पड़े जैसे विभिन्न संस्थाओं जैसे नगरपालिका , सुरक्षा प्रबंधन अधिकारीयों से मिलना और उनके व्यव्हार से रूबरू होना और वास्तव में हमे यह महसूस हुआ की समाज के अधिकतर विभाग का व्यव्हार समाज के प्रति नकारात्मक होता है!

स्वयं का अनुभव मैं आप सभी के साथ साँझा कर रहा हु – मैं अपने मित्र के साथ पुलिस ऑफिस में permission letter लेने के लिये गए तो हमने वहा के एक अधिकारी से बात की। उसने हमे दुसरे अधिकारी के पास भेज दिया और ऐसे ही हमे दुसरे से तीसरे के पास भेज दिया और अंत में जब हम उच्च अधिकारी से मिले तो उस अधिकारी का व्यव्हार और भाषा मुझे कुछ सभ्य व्यक्तियों के तरह नहीं लगा ! उसने हमसे ऐसे प्रशन किये जैसे की हम अपराधी श्रणी में है! जैसे हाँ भई क्या है, किसलिए आये हों , क्यों परेशान कर रहे हों , अभी 26 जनवरी को तो परेड हुई थी तुम क्या करोगे निकलकर । ये बड़ा ही दुभाग्य पूर्ण था की हमारे देश में कानून कैसे साधारण आदमियों को अपने अधिकारों के लिये , अपनी आज़ादी के समाज की भलाई के लिये , उन्हें बोलने तक का मौका नही दिया जाता ! वास्तव में मुझे उस समय काफी निराशा हुई की हमारी सुरक्षा उन हाथों में है जो हमसे सीधे मुहं बात तक करना पसंद करते और शायद इसी कारण आम व्यक्ति पुलिस वालों की भाषा , व्यव्हार , प्रतिक्रिया अदि को देखकर अपने अधिकारों के लिए नही बोल पता!

लेकिन मुझे ख़ुशी है की मैं एक ऐसी संस्था में काम करता हु जो मानव अधिकारों के लिये , समाज की भलाई के लिये , महिलाओं के अधिकारों के लिये कार्य करती है. मगर हमारे इतने सारे प्रयासों में अच्छे अनुभव ज्यादा है. schools में जाकर बच्चों की संख्या लेना और walkathon में जो schools की भागेदरी भी सराहनीय रही !

अंत में मैं कहना चाहूँगा की जब प्रोग्राम हुआ, चारों तरफ उसकी ही चर्चा हुई! कोई अख़बार ऐसा नही था जिसमे ब्रेकथ्रू की इस walkathon की चर्चा न हुई हों! यह मेरे जीवन के सबसे महतवपूर्ण अनुभव में से है जो मैंने आपसे सांझे किये!

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