साल ख़तम होने जा रहा है और महामारी के कारण, इस साल का अनुभव बहुत ही अलग रहा। पर जब हम ब्रेकथ्रू में इस साल के बारे में सोचते हैं तो एक ख़ुशी का पल जो हमेशा याद आता है, वो है 8 मार्च का दिन जब ब्रेकथ्रू के ‘दे ताली’– किशोर-किशोरी सशक्तिकरण कार्यक्रम से जुड़े दो पीयर एजुकेटर्स- अंजलि और मीरा को ईस्टर्न भूमिका महिला सम्मान अवार्ड से सम्मानित किया गया। यह पल ब्रेकथ्रू में सब के लिए ख़ास है पर दो लोगों के लिए बहुत ही ख़ास है।

 

हिना मुनीर जो ब्रेकथ्रू में ट्रेनर हैं कहती हैं:

“जब कुछ सालों पहले अंजलि ब्रेकथ्रू से जुड़ी तो उसकी आँखों में कुछ सपने पनपे और उन्हें पूरा करने का उसने सोचा। वो पिछले तीन सालों से लगातार अपनी मुहिम चला रही है अपने गाँव की तस्वीर बदलने की– सिर्फ गाँव का नाम ही कूड़ामऊ से सुंदर नगर न बनाने बल्कि उसे हर मायने में सुन्दर गाँव बनाने के लिए। 

उसे इन प्रयासों को अलग अलग मंच पर साझा करने का अवसर मिला और उसे सम्मानित भी किया गया। मगर इस बार कुछ अलग ही ख़ुशी थी। इस बार उसे एक ऐसी सशक्त महिला के तौर पर सम्मान मिला था जो अपने जीवन और दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम हुई। 

जब अंजलि को अवार्ड मिला, उस समय मुझे लगा मानो यह सिर्फ अंजली की कहानी न हो। मेरी यानि हिना के काम की भी कहानी है। वो सम्मान अंजली को ही नहीं मानो मुझे भी मिल रहा था। ब्रेकथ्रू की मुहिम थी किशोरियों के सशक्तिकरण की। जब मैंने ब्रेकथ्रू की ट्रेनर के रूप में लखनऊ के गोसाईंगंज ब्लाक में स्थित अंजलि के गाँव में जाना शुरू किया तो मुझे किशोरियों के साथ कार्य का पहले से अनुभव नहीं था। किंतु जिन सामाजिक मान्यताओं के कारण उस गाँव की लड़कियों का समुचित विकास अवरुद्ध था वो दिक्कतें मैंने अपने जीवन में भी झेली थीं। इसलिए शायद गाँव की किशोरियों से जुड़ाव बनाने में मुझे बहुत समय नहीं लगा। 

जब मैं अंजलि से मिली थी तो गाँव की बाकी किशोरियों की तरह उस पर भी ऊपर बोलने, घर से बाहर निकलने और सबके सामने अपने विचार साझा करने पर पाबंदियाँ थीं। इस कारण उसमें भी आत्म विश्वास की कमी थी। किंतु वह मेरी हर बात ध्यान से सुनती ज़रूर थी और बोलती-‘’कह तो आप ठीक रही हैं”। गाँव में मैंने किशोरियों के साथ बैठक और चर्चा करना शुरू किया तो उन्होंने अपनी मन की बातें साझा करनी शुरू की। सब अपने गाँव के नाम को लेकर लज्जित अनुभव करती थीं। वे अपने गाँव का नाम ‘’कूड़ामऊ’’ से बदलकर ‘’सुंदर नगर’’ करना चाहती थीं। मुझसे पहले इस गाँव में कार्य कर रहे मनीष जी ने उन्हें इस हेतु दीवार लेखन का सुझाव दिया था किंतु किशोरियां झिझक के कारण कर नहीं पायीं थीं। 

मैंने उनके साथ मिलकर गाँव में दीवार लेखन और पेंटिंग का कार्य शुरू किया। किशोरियों के द्वारा इस कदम को उठाने पर कई गाँव के लोगों ने उनका मज़ाक बनाना शुरू किया। किंतु मैंने उनको उत्साह बनाए रखनें और स्वयं पर विश्वास रखने को कहा। धीरे धीरे अंजली इन कार्यों में अगुआई लेने लगी। उसके बढ़ते हौसले को समय समय पर मार्गदर्शन देकर मैं उसे और प्रेरित करती। उसके कौशल और हौसले को बढाने के लिए मैंने उसे पीयर एजुकेटर प्रशिक्षण, कॉमिक्स कार्यशाला, मीडिया कार्यशाला तथा ब्रेकथ्रू के अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए चुना। अंजली का आत्म विश्वास और कौशल बढ़ता गया और जब वह यह सब अन्य किशोरियों के साथ साझा करती तो वे भी प्रेरित होकर उसका साथ देने को तत्पर होती गयीं। 

जब इन किशोरियों ने सरकार के रात्रि चौपाल कार्यक्रम में अपनी मांग रखी और आला अधिकारियों ने आश्वासन दिया की वे गाँव का नाम बदलने में यथासंभव सहयोग करेंगे तो गाँव वालों की आँखें खुल गयीं और इन किशोरियों की विकसित होती शक्ति और आत्म विश्वास की प्रशंसा होने लगी। 

आज जब हमारी किशोरी को एक सशक्त परिवर्तनकारी महिला के रूप में महिला दिवस पर सार्वजनिक सभा में सम्मान मिला तो लगा की ये हमारे सशक्तिकारण के प्रयास की सार्थकता का प्रतीक है।”

 

श्वेता मिश्रा जो ब्रेकथ्रू में कम्युनिटी डेवलपर हैं कहती हैं:

“मीरा पहली बार मुझे ‘दे ताली’ कार्यक्रम के एक गतिविधि के दौरान लखनऊ के मोहनलालगंज ब्लाक में स्थित उसके गाँव में मिली। वह हमारे कार्यक्रम को दूर से खड़े हो कर देख रही थी। मैंने उसे बताया कि हम ब्रेकथ्रू संस्था से हैं और हम गाँव में बच्चों का एक समूह बना कर उनके साथ 4 साल तक काम करेंगे और उन्हें लैंगिक भेदभाव, जीवन कौशल, शिक्षा के प्रति जागरूक करेंगे| मीरा हमारे साथ जुड़ना चाहती थी पर उसे घर के काम और उसके आने जाने की परमिशन, घर में बड़े भाई और पापा के गुस्सा की चिंता थी। 

मैंने मीरा से मिल कर उसके बारे में जाना, उसे सहज महसूस करवाया जिस कारण उसने अपनी बहुत सी बातें साझा की। हम मीरा के घर गये और उसके माता पिता से भी मिले | बात किया और उसे अपनी मीटिंग में आने के लिए उसके पापा को राज़ी करा लिया। ऐसे ही हम उसे ग्राम स्वास्थ एवं पोषण दिवस (VHND) में ले गए। इससे धीरे धीरे उसकी झिझक खुली और वो अब अपने आप कहने लगी दीदी हम और लड़कियों को भी बुला लायेंगे। उसकी स्वास्थ्य के मुद्दों एवं सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर बेहतर समझ एवं रूचि विकसित हुई। 

इसी कारण एक बार आंगनवाड़ी कार्यकर्ता (आशा जी) ने मीरा को गाँव का ब्रेस्ट कैंसर का सर्वे करने का काम भी दिया। शुरुआत में उसमे झिझक थी पर समझाने पर उसने बहुत अच्छे से काम किया। इस अनुभव ने मीरा को नया आत्म विश्वास दिया तथा मुझे भी उसकी क्षमता, समझ और कौशल के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली। 

हमारी संस्था से मीरा को चुना गया दिल्ली में होनेवाले प्रधान मंत्री के कार्यक्रम में प्रतिभागिता हेतु। बहुत ख़ुशी हुई किंतु घर से दूर और किसी अनजान के साथ भेजने में उसके परिवार वालों को डर लग रहा था। मीरा के पिता जी को मैंने समझाया और आश्वासन दिया की मीरा सुरक्षित रहेगी। आखिरकार मीरा मेरे साथ दिल्ली गयी। मीरा एक हफ्ते दिल्ली रह कर, नए लोगो से मिल कर, अन्य प्रदेश से आये हुए बच्चों से मिलकर और प्रधान मंत्री से मिलकर काफी खुश हो गयी और उसका आत्म विश्वास बढ़ा। अब वो पहले वाली मीरा नहीं थी।  इस यात्रा से वो वापस आ कर एकदम छा गयी। अब लोग उससे मिलने में अपना सौभाग्य मानने लगे।  आखिर प्रधान मंत्री से मिलना कोई मामूली बात नहीं होती। फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वो आगे बढ़ती गयी और आज इस  मुकाम तक आ गयी कि हम उसे नारी  सम्मान अवार्ड मिलते देख कर ताली बजा रहे हैं। 

मुझे लगता है कि ये उसकी जीवन यात्रा के तौर पर एक नया पड़ाव है। वो 3 सालों से लगातार अपने गाँव में महिलाओं और किशोरियों के साथ जुड़ कर काम कर रही है जिसके लिये उसको अलग अलग प्लेट फॉर्म पर हिस्सा लेने का और अपने अनुभव साझा करने का मौका मिला। लेकिन अबकी बार मीरा को महिला दिवस के अवसर पर  नारी सम्मान समारोह में पहचान मिली एक सशक्त नारी के रूप में। जब वह कार्यक्रम से जुडी थी तो किशोरी थी किंतु आज वह एक नारी के रूप में सम्मानित की जा रही थी। यही तो सपना था हमारे ‘दे ताली’ कार्यक्रम का! हमारी किशोरियां सशक्त नारी के रूप में पहचानी जाएँ और सामाजिक बदलाव की मुहिम में जुड़ें।”

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