December 20, 2017

समान काम के लिए समान वेतन, तो घर के कामों में बराबरी क्यों नहीं?

बचपन से मैंने अपनी माँ को जब भी देखा, खूब मेहनत करते ही देखा है। सुबह से शाम तक खेतों में कमरतोड़ मेहनत; चाहे वह फसलों से खरपतवार निकलने का काम हो, धान रोपाई का काम हो या फिर गेंहू और धान काटने का काम हो, मेरी माँ ने पुरुषों...

Image
Sanjay

Kumar


बचपन से मैंने अपनी माँ को जब भी देखा, खूब मेहनत करते ही देखा है। सुबह से शाम तक खेतों में कमरतोड़ मेहनत; चाहे वह फसलों से खरपतवार निकलने का काम हो, धान रोपाई का काम हो या फिर गेंहू और धान काटने का काम हो, मेरी माँ ने पुरुषों के बराबर कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है। कई बार पुरुष लोग बीड़ी पीने या हुक्का गुड़गुड़ाने के बहाने कुछ देर आराम भी कर लेते थे लेकिन तब भी वो या तो काम में लगी रहती या उन्हें पानी वगैरह देती। खेत का काम निपटाने के बाद उसे ही पशुओं का चारा भी काटना होता। लेकिन यहीं पर उसका विराम नहीं था बल्कि यह काम की श्रंखला का सिर्फ एक हिस्सा भर होता था।

सुबह जब सभी सो ही रहे होते तो मुँह अंधेरे उठकर सबसे पहले पशुओं का गोबर उठाना, उपले बनाना, उन्हें चारा पानी देना, उसके बाद फिर सबके लिए चाय तैयार करना और पूरे परिवार के लिए खाना बनाना भी उसी के ज़िम्मे होता। उसके बाद सबके झूठे बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना, गोबर लीपना, कपड़े धोना  भी उसी की दिनचर्या का एक आवश्यक अंग था और बिस्तर पर या खाट पर ही खाना और पानी हासिल करना शायद घर के पुरुषों का एकाधिकार। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि मेरे पिता को ये एकाधिकार किसने दिया कि उसने आजतक खुद से कभी एक गिलास पानी तक लेकर नहीं पीया है । हाँ अगर कभी खाना उसकी मनपसन्द का नहीं बना या रोटी कुछ जल गई या थोड़ा सा लेट हो गया तो गालियों के साथ थाली फेंक देना उसने ज़रूर सीख रखा था और उनकी यह सामंती पितृसत्तात्मक ठसक आजतक बरकरार है।

पितृसत्ता के कारण जन्म से ही दुनिया के हर जाति, हर धर्म, हर वर्ग और हर नस्ल के पुरुषों को महिलाओं पर यह अधिकार हासिल हो जाता है। पितृसत्ता हमारे दिमागों में भी अवचेतन रूप से घर किये हुए है, घर के काम को साझा मानते हुए भी पितृसत्ता के फायदों को छोड़ पाना बहुत मुश्किल होता है। रसोई का काम या सफाई का काम करते हुए भी ये कहकर कि मैंने तुम्हारे काम में मदद की है; लगता है जैसे कि उन पर कोई अहसान जता रहें हो। अगर कोई संवेदनशील, जागरूक पुरुष, महिला के कामों में हाथ बटाता दिख जाता है तो पितृसत्ता की शिकार महिलाएं ही उसे जोरू का गुलाम, औरतों को सिर पर चढ़ाने वाला करार दे देती हैं।

यह कहानी सिर्फ मेरे माँ बाप की ही कहानी नहीं है बल्कि गाँव से शहर तक, फॅक्टरीपेशा या नौकरीपेशा, ज्यादातर हर घर और हर महिला की यही सच्चाई मैंने देखी और महसूस की है। लोगों को ये लगता है कि केवल नौकरीपेशा महिलाएं ही काम करके तनख्वाह घर लाती हैं। किसान और मज़दूर महिलाएं और घर पर ही रहकर काम करने वाली औरतों को कभी इस दर्जे से देखा ही नहीं जाता। लेकिन वो भी बराबर का बल्कि अपने घर के पुरुषों से ज्यादा ही काम करती हैं।

अब शिक्षा व तकनीक के प्रसार के साथ महिलाओं के बाहर के काम व काम के घण्टे काफी बढे हैं लेकिन उसके बावजूद घर के घरेलू काम और बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल अभी भी महिलाओं के ही ज़िम्मे हैं। इस तरह से देखा जाए तो महिलाओं पर काम का बोझ कम होने की बजाए दुगुना हो गया है। पुरुष केवल बाहर के काम को या वैतनिक कार्य को ही अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं और घर का काम उन्हें अपनी ज़िम्मेवारीे बिल्कुल नहीं लगतीे । सुबह ये सभी काम निपटाने और समय से ड्यूटी पहुंचने की जद्दोजहद के बीच अधिकांश बार महिलाओं के लिए अपने लिए नाश्ता करने का भी वक़्त नहीं बच पाता जिस कारण थकान, कमज़ोरी और कई बीमारियों का शिकार हो जाती हैं  महिलाएं।

आज एक ही घर में पुरुष और महिला बराबर की ड्यूटी करके दोनों ही थककर घर आते हैं, तो पुरुष टीवी चलाकर या अखबार खोलकर बैठ जाएगा जबकि महिला उसके लिए पानी या चाय बनाकर लेकर आती है। अगर महिला देर से काम करके आती है तब भी सभी काम उसी के ज़िम्मे हैं। सुबह उठकर बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, खुद तैयार होना, पति के कपड़े देना, टिफिन तैयार और घर के बाकी काम निपटाना व आकर फिर से घर के सभी काम करना उसकी मजबूरी है। सशक्तिकरण के दावों ने महिलाओं की हालत और खराब की है क्योंकि अब बच्चों का दाख़िला, उनकी फ़ीस भरना, पी टी एम अटेंड करना, बिजली, पानी, टेलीफ़ोन का बिल भरने का भार भी उसके ऊपर आ गया है और महिला सशक्तिकरण के नाम पर पुरुषों ने इस ज़िम्मेवारीे  से भी मुक्ति पा ली है।  और तो और बस या रेलवे की टिकट की लाइन में भी औरत को लगाकर वो मुक्त हो जाते हैं।

हम बाहर समान काम के लिए समान वेतन की न्याय पूर्ण मांग अब करने लगे हैं लेकिन घर मे समान काम और समान ज़िम्मेवारीे की मांग को भी हमें अब अपनी मुहिम का हिस्सा बनाना होगा और हमें ये समझना और समझाना होगा कि जब घर हमारा साझा है तो घर और बाहर के काम भी साझे होने चाहिए। जैसे महिलाएं आज बाहर के कामों में, सामाजिक कामों में हिस्सा लेने लगी है वैसे ही पुरुषों को भी घर के कामों में हाथ बटाना और उसे अपनी ज़िम्मेदारी समझना शुरू करना होगा तभी वास्तविक समानता आ पाएगी।

Leave A Comment

4 Comments

  • Rahul

    December 20, 2017 Reply

    Bhut badiya sir ji

  • Deepak kathuria

    December 21, 2017 Reply

    Very nice bro

  • Shivcharan Dhyani

    December 25, 2017 Reply

    Bilkul, me aapki bat se 100% shmat hu

  • Arati

    May 7, 2020 Reply

    sahi baat boli aapne. mai ek doctor hu aur mere pati ghar ke kam bhi karate hai kyunki caring nature ke hai .aur is ke mai apane aap ko lucky samazati hu. Par hum aurate aisa kyun samazati hai ..jabki equally bahar se thak ke aane ke baad ,agar dono ghar ke kam me hath bataye to ye normal hi hai . par hum logo ne bachapan se bahot kam dekha hai ki ,Mard ghar ke kamo me hath bata rahe hai .is karan humare dekhane ka najariya hi badal gaya hai.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *