December 11, 2017
वैवाहिक बलात्कार: महिलाओं को ना कहने का अधिकार कब मिलेगा?
आज एक ओर जहाँ महिला सशक्तिकरण के लिए बड़े-बड़े कार्यक्रम चला कर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जा रही हैं, वही दूसरी ओर कुछ पुरुष महिलाओं को सिर्फ़ मनोरंजन साधन के रूप में देख रहे हैं। जी हाँ ये आज के आधुनिक युग की सच्चाई है, आज घर...
Farman
Ahmed
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आज एक ओर जहाँ महिला सशक्तिकरण के लिए बड़े-बड़े कार्यक्रम चला कर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जा रही हैं, वही दूसरी ओर कुछ पुरुष महिलाओं को सिर्फ़ मनोरंजन साधन के रूप में देख रहे हैं।
जी हाँ ये आज के आधुनिक युग की सच्चाई है, आज घर के बाहर ही नही बल्कि अपने घर में भी महिलाएं सुरक्षित नही हैं। हर दिन विवाहित महिलाओं के साथ घर में भी बलात्कार हो रहा है और ये बलात्कार करने वाले कहीं बाहर से नही आते है, ये इनके वो अपने होते है जिन्होंने भारतीय परम्पराओं के अनुसार सात जन्म तक साथ देने का वादा किया है। ये जुर्म तेज़ी से देश में बढ़ता जा रहा हैं।
अन्य देशों की बात करें तो सबसे पहले 1932 में पोलैंड ने वैवाहिक बलात्कार के लिए कानून बनाया था। सत्तर के दशक में नारीवाद की दूसरी लहर के प्रभाव के तहत ऑस्ट्रेलिया ने 1976 में वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना था। इससे पहले दो दशकों में, कई स्कैंडिनेवियाई देशों जैसे स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क, और पूर्व सोवियत संघ और चेकोस्लोवाकिया सहित इन देशों ने पति-पत्नी बलात्कार के अपराधों को पारित कर दिया। अमेरिका में 1970 और 1993 के बीच, सभी 50 राज्यों ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना और 1980 के दशक से, कई आम कानून देशों ने वैधानिक रूप से वैवाहिक बलात्कार को समाप्त कर दिया है। इनमें दक्षिण अफ्रीका, आयरलैंड, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, न्यूजीलैंड, मलेशिया, घाना और इज़राइल शामिल हैं। एशिया की बात की जाए तो नेपाल ने 2002 में वैवाहिक बलात्कार के अपवाद से छुटकारा पा लिया है।
सुनने में बहुत अजीब लगता है कि पति भी अपनी पत्नी का बलात्कार कर सकता हैं। मगर वैवाहिक बलात्कार आज एक भयावह सच बन कर समाज के सामने आ रहा है जिस कारण एक महिला लंबे समय तक नरकीय जीवन व्यतीत करने को विवश है और इस पुरुष प्रधान समाज मे वो वैध है।
पत्नी की मर्ज़ी ना होना, उसका सेक्स के लिए मना कर देना, एक पुरुष को पुरुष प्रधान समाज मे अपनी आन और अहम पर प्रहार जैसा प्रतीत होने लगता है और यही जन्म होता है वहशीपन जो कभी कभी उस महिला के कल्पना शक्ति से भी बाहर होता है। अपनी मर्दानगी दिखाते हुए फिर वो पुरुष महिला पर अपना एकाधिकार समझते हुए ज़बरदस्ती करने लगता हैं । पत्नियाँ शर्म के कारण इसका विरोध नही कर पाती है जिसका उनके शारीरिक और मानसिक दोनों पहलुओं पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है।
कोई पति या पत्नि एक दूसरे के शरीर पर सिर्फ़ इसलिए हक़ नही जमा सकते के उसने उससे विवाह किया है, इस रिश्ते में दोनों की भावनाओं को अहमियत दिया जाना बेहद ज़रूरी हैं । संबंध बनाना ये दोनों की सहमति पर निर्भर करता हैं। एक महिला जो अपने पति को समाज में परमेश्वर और मजाज़ी ख़ुदा का दर्जा देती है वो उसके ख़िलाफ़ कैसे खडी हो सकती हैं, वो कैसे अपनी व्यक्तिगत समस्या किसी से शेयर कर सकती है, ये बड़ा सवाल बना हुआ है और यही इस हिंसा पर चुप्पी की एक मुख्य और बड़ा कारण हैं।
अगर किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ जबरन संबंध बनाया जाए तो वो यौन उत्पीड़न के दायरे में आता है जिसके खिलाफ़ सख्त कानून है। लेकिन अगर यहीं काम एक पति अपनी पत्नी के साथ करें तो उसे विवाद और संस्कार जैसे भारी शब्दों के बोझ तले दबा दिया जाता है। क्या पतियों द्वारा जबरन संबंध बनाने पर महिला को पीड़ा नहीं होती? क्या उसे असहनीय दर्द से नहीं गुजरना पड़ता?
वैवाहिक रेप के खिलाफ सालों से कानून की मांग हो रही है और ये बहस लंबे वक्त से चल रही है लेकिन हर बार इस पर भारतीय समाज मे स्थापित पुरुषवादी वर्चस्व के प्रवक्ता तंत्र की तरफ से निराशा ही हाथ लगी है । सरकारी पक्ष के अनुसार अगर वैवाहिक बलात्कार के ख़िलाफ़ कोई कानून बनाया तो इससे परिवार पर बुरा असर पड़ेगा और घरेलू हिंसा के अनुपात में वृद्धि हो सकती है।
राजनैतिक पार्टियों में ऊँचे ओहदों पर बैठे लोग भी वैवाहिक बलात्कार पर अपनी चुप्पी छोड़ते हुए उसके समर्थन में ही अपने विचार रखते नज़र आते हैं। उनको लगता हैं इस हिंसा पर कानून बनाना कारगर साबित नही होगा। उनके अनुसार महिलाएं ऐसे अपराधों की शिकायत नही करेंगी । इस बात को नकारा भी नही जा सकता है पर इस तरह का कानून आने से महिलाओं को अपनी चुप्पी तोड़ने के लिए एक वैधानिक मार्ग मिल सकता है।
सरकार का कहना है कि भारत में आज भी महिलाएं दहेज़ और घरेलू हिंसा के विरुद्ध शिकायत तक दर्ज नहीं करा पाती है ऐसे में वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस तरह के नियम-कायदों से परिवार और विवाह जैसी संस्था की नींव हिल जाएगी। अब देखना ये है कि भारत में तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं इस अपराध का सामना महिलाएं कब तक करेंगी, कब महिलाओं को ना कहने का अधिकार मिलेगा।
वैवाहिक बलात्कार को कानून की श्रेणी में आने से क्यों भारत हमेशा से पुरुष प्रधान रहा हैं? यहाँ का सविंधान तो महिलाओं को बराबरी का हक देता है पर उसकी ज़मीनी हक़ीकत बिलकुल विपरीत हैं। आखिर क्यों ?
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