मैं, मेरा फैसला, मेरा वजूद।.

इस आधुनिक युग मे हम महिलाओं की उपलब्धियों को हर क्षेत्र में देख रहे हैं। ऐसे बहुत से क्षेत्र है जिन्हे पुरुषों के लिए ही समाज ने निर्धारित किया था लेकिन आज महिलाएं भी उस क्षेत्र में अपनी छमता और कौशल का लोहा मनवा रही हैं। विज्ञान से लेकर खेल जगत तक हर किसी क्षेत्र में महिलाएँ ना केवल बढ़ चढ़ कर भाग ले रही हैं बल्कि अपनी मेहनत के दम पर  देश के लिए गोल्ड मैडल भी ला रही हैं। 

इन सब उपलब्धियों के बाद भी महिलाओं को पितृसता की अदालत में बार बार अपनी योग्यता का प्रमाण देना पड़ता है। फिर चाहे सड़क पर गाड़ी चलाते समय किसी पुरूष की ये टिप्पणी हो, “इनको लाइसेंस कौन देता है” या फिर ऑफिस में प्रोमोशन मिलने पर अन्य सह-कर्मियों की ये टिप्पणी, “लड़की होने की वजह से ही प्रोमोशन मिला है”। इस तरह की टिप्पणियां मानो ज़िंदगी का एक हिस्सा ही बन गयी हैं। ऐसी टिप्पणियों से महिलाएँ को रोज़ाना सामना करना पड़ता है। लेकिन ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है जब अपने आप को फेमिनिस्ट कहने वाले पुरुष भी दबे-कुचले शब्दों में ऐसी टिप्पणियों को व्यक्त करते हैं और अपने दिमाग की पितृसत्तात्मक सोच को दूसरों का नाम लेकर बहुत चालाकी से बोल देते हैं।

ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो किसी ना किसी वजह से अकेले रह रही हैं। यहाँ अकेले रहने से मेरा मतलब है जिन्होंने शादी नही की या फिर तलाक ले लिया है और इसके अलावा अकेला रहना महिलाओं का अपना निर्णय भी हो सकता है या फिर मजबूरी भी। अकेले रहना या न रहना उनका निर्णय और अधिकार है। लेकिन अकेले रहने वाली महिलाओं से सामाजिक जवाबदेही माँगी जाती है। हमेशा ऐसी महिलाएँ बहुत सारे सामाजिक सवालों और टिप्पणियों से घिरी रहती हैं। बहुत बार ये सवाल खुले तौर पर सामने आते हैं तो कभी कभी सिर्फ घूरती हुई निगाहों के ज़रिये। बहुत सारे सवाल तो सिर्फ इस बात के लिए होते हैं की अभी तक सिंगल क्यों हो? और अगर तलाक हो चुका है तो क्यों? आप चाहे अपनी ज़िंदगी में किसी भी मुक़ाम पर हो लेकिन ये सवाल पीछा नही  छोड़ते। समाज के सवाल जाने अनजाने में तकलीफ़ बहुत देते है। लेकिन थोड़ा यह सोच कर मन को समझा लेते हैं कि उनकी सोच पितृसत्ता से जकड़ी हुई है। लेकिन हद तो तब हो जाती है जब आपके साथ काम करने वाले सहकर्मी भी आपके बारे में यही सवाल का जवाब जानना चाहते हो। 

अकेली लड़की चाहे कितना भी अपने क्षेत्र में क़ामयाबी हासिल कर ले लेकिन जब भी वो अपने लिए किसी शहर में किराये का मकान देखने जाती है तो उससे सबसे पहले यही पूछा जाता है कि शादीशुदा हो या नही ? जैसे ही जवाब ना में दिया गया मकान किराए पर रहने के लिए देना तो दूर की बात है, लड़की के चरित्र पर उंगलियां उठने लगती हैं। जिस वजह से किराये पर रहने के लिए मकान मिलने में बहुत परेशानी होती है। अगर कोई महिला तलाक़शुदा है तो उस महिला के बारे में यह टिप्पणी की जाती है कि ये तो अपना घर ही नही बसा पायी और क्या करेगी ज़िंदगी में।

ग़ौरतलब है कि एक महिला की जिंदगी पर तमाम उम्र सिर्फ पुरुषों का ही कब्ज़ा रहता है। जब वो पैदा होती है तो पिता का कब्ज़ा, जब वो स्कूल जाने लगती है तो भाई का कब्ज़ा। शादी के बाद पति और फिर बेटों का। अकेली महिलाओं को समाज स्वीकार नहीं करता। इसी वजह से बहुत सारी महिलाओं को अपना सपना मार कर घर बसाना पड़ता है  और उसके लिए वो घरेलू हिंसा भी झेलती हैं। आखिर क्यों एक महिला अपने अनुसार जीवन नही जी सकती। बार – बार क्यों उसको समाज की अग्नि परीक्षा से होकर गुज़रना पड़ता है। 

महिलाओं के जीवन को पितृसत्ता ने अपनी बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। समाज मानने को तैयार ही नही है कि  महिलाओं के अधिकार होते हैं, वह अकेली रह सकती हैं, वह हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकती हैं। 21 वी सदी में भी महिलाओं को बार बार अग्नि परीक्षा देनी पड़ रही है।

तू कर अपने होश ले बुलंद तुझे कोई हरा न पायेगा

तू कल भी थी, तू आज भी है, तू हमेशा रहेगी ओर एक दिन दिन तू  हर खोखली सोच से जीतेगी

ओर देखना हारेगी ये पितृसत्ता सोच जिसने हमेशा तुझे पाँव की जूती समझा, टूटे गी ये बेड़ियाँ

ओर तुम अपनी जिंदगी के फैसले खुद करोगी ।

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