Read our COVID-19 Emergency Response here

इतनी सरल सी बात को समझने में इतनी जटिलता क्यों?.

महिलाओं द्वारा कही गयी ना को पुरुषों के लिए स्वीकार करना इतना कठिन क्यों होता है? आज कुछ पुरुषों से हुई एक वार्ता के बाद से एक वाक्य ने मन  बिल्कुल खिन्न सा कर दिया है कि “महिलाओं की नामें हाँछुपी होती है!” इस विकृत नासमझी भरे वाक्य ने मुझे अपने विचार लिखने पर बाध्य कर दिया है। 

आज इक्कीसवी शताब्दी के इस वैश्वीकरण के युग में जब हम हर चीज़ का शॉर्टकट ढूँढ़ते हैं तो प्रश्न यह है कि क्यों हम किसी नारी द्वारा दिए गये सीधे जवाब ‘’ना‘’ को नहीं स्वीकार कर पाते? नकार करके उसके पीछे अपनी विकृत मानसिकता के अनुसार मनगढ़ंत अर्थ क्यों लगाने पर आमादा हो जाते हैं?

क्या वास्तव में हमारे जीवन में अब इतनी रिक्तता का वास हो गया है कि इस प्रकार की सीधी सरल बात पर विमर्श करना पड़े? यदि महिला नाकह रही है तो वास्तव में वह हाँकहना चाह रही है?

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि आज के इस विकसित कहलाये जाने वाले युग में महिलाओं के कार्य व पहनावे की स्वतंत्रता के विरुद्ध जहाँ  ‘लाज-हयाकी दलीलें दी जाती हैं, वहाँ यह कहना कितना न्याय या तर्कसंगत है कि “कहना तो हाँचाहती थी लेकिन लज्जावश ‘न’ कह गयी।’

कई लोग इस पर कहते हैं की ये सब फिल्मों का असर है। पर एक प्रश्न यह भी है कि क्यों आज फ़िल्मी दुनिया वास्तविक  दुनिया पर इतनी हावी होती जा रही है? ऐसी फिल्में क्यों बनाई जा रही हैं? हमारा विवेक कहाँ है? यदि इन फ़िल्मों की पकड़ इतनी मज़बूत होती ही जा रही है तो समाज में उन फ़िल्मों को ही क्यों उदाहरणार्थ  प्रस्तुत किया जा रहा है जो औरतों की ना को हाँ मानती है, उन फ़िल्मों से हम क्यों इतना प्रभावित नहीं होते जो इसका विरोध करती हैं?

क्यों महिलाओं से समाज की प्रत्येक (जायज़ अथवा ना जायज़) माँग पर समर्थन की आशा की जाती है? क्यों आज भी ना कहने वाली अधिकतर महिलाओं को अलग-अलग रूपों में कहीं ना कहीं दबा दिया जाता है या कलंकित किया जाता है? कौन हैं वे जिन्हें महिलाओं के मात्र ना कहने पर उन्हें प्रताड़ित करने का अधिकार है एवं कौन हैं वे जिन्होनें ऐसे व्यक्तियों को यह करने का अधिकार प्रदान किया ?

आखिर इस पुरुष वर्चस्ववादी समाज में आज भी एक अत्यंत छोटी सी, सरल सी बात को समझने में इतनी जटिलता का आभास क्यों हो रहा है?

जटिलताएँ तो हैं ही….

क्यों हैं..?

क्या हैं..?

कब से हैं..?

कब तक हैं..

किसे हैं..?

किसकी वजह से हैं..?

प्रश्न तो बहुत हैं। पर हमें याद रखने की ज़रुरत है कि कभी कभी कहे गए वाक्य के आगे पीछे जटिलता लाने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। उसे सिर्फ जितना कहा जाता है उतना ही समझ लेना पर्याप्त होता हैं। ऐसा ही एक शब्द है ‘नहीं’ जो की एक पूरा वाक्य भी है और जब यह महिला के द्वारा पुरुष को कहा जाये विशेषकर किसी प्रकार की दोस्ती या सम्बन्ध के प्रस्ताव के जवाब के रूप में तो उस पुरुष को समझ कर स्वीकार कर लेना चाहिए। ऐसे प्रकरण में आगे किसी प्रकार की चर्चा का कोई स्थान नहीं, आखिर ना का मतलब ना होता है। 

 

Leave A Comment.

1 thought on “इतनी सरल सी बात को समझने में इतनी जटिलता क्यों?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get Involved.

Join the generation that is working to make the world equal and violence-free.
© 2020 Breakthrough Trust. All rights reserved.