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रीती रिवाज़ के कारण किए हुए ख्वाहिशों का त्याग।.

ग्रेजुएशन का समय, एक ऐसा समय होता है जहाँ सभी अपने ज़िंदगी तथा अपने सपनों को पूरा करने के पीछे भाग रहे होते हैं। ऐसी ही कहानी है एक स्नातक कॉलेज से, जहाँ अनेक राज्यों से छात्र एवं छात्राएँ पढ़ने तथा अपने सपनों को ऊँचाई देने पहुँचते हैं। यह एक दिल्ली का कॉलेज है, जिसमें एक लड़की (सादीमा) अपने सपनों का पीछा करते हुए पहुँचती है। वह कश्मीर के घाटियों के एक छोटे से गांव से आती है। उसी कॉलेज में एक लड़का, बिहार से आता है। दोनों का विषय एक होने की वज़ह से एक ही क्लास में उनकी पढ़ाई-लिखाई शुरू हो जाती है। कुछ दिन बीतने के बाद, उनके बीच आकर्षण बढ़ने लगता है जिसकी वज़ह से वे काफ़ी घुलमिल जाते हैं। एक दूसरे से प्रेम सम्बन्ध में बंध जाते हैं।

हमारा समाज और उसकी धारणायें, जिसकी वज़ह से कितनों की ज़िंदगी सवर गयी, मगर न जाने कितनों को उन रीती-रिवाज़ों की वज़ह से अपने सपनों तथा ख्वाहिशों का त्याग करना पड़ा। लड़का (दीपक) जिसे यह पता चलता है कि लड़की कश्मीर की है। उसे इस बात की चिंता सताने लगती है। अलग-अलग जाति से होने की वज़ह से उनके सामने एक और समस्या आ खड़ी हो जाती है। उनका ऐसा मानना है कि हमारा समाज इस अन्तरजातीय संबंध को कभी स्वीकार नहीं करेगा। ऐसे में उनको अपने भविष्य को लेकर बहुत दिक्कतें आ रही थी। इन कारणों से हार मान सादीमा और दीपक एक दूसरे से शादी करने की आशा छोड़ देते हैं। उदासी और निराशा की भावना उन्हें घेर लेती है

यह एक राष्ट्रीय मुद्दे को दर्शाता है। इन्ही सारी वज़ह के कारण हमारे समाज में जातिवाद और भेदभाव जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इस कहानी से हमे यह पता चलता है कि समाज में फैली, ऐसी असाधारण धारणाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाना चाहिए ताकि आज की युवा पीढ़ी अपने सपनों को एक नई ऊँचाई दे सके। प्यार और शादी-संबंधों में जाति का मसला ना रहे। इंसान को इन सारी छोटी-छोटी समस्यायों को दूर कर, इनसे कहीं ऊँचा उठ अपने देश तथा खुद के विकास पर ध्यान देना चाहिए न की इन छोटे मसलों पर।

Note: 2018 में ब्रेकथ्रू ने हज़ारीबाग और लखनऊ में सोशल मीडिया स्किल्स पर वर्कशॉप्स आयोजित किये थे। इन वर्कशॉप्स में एक वर्कशॉप ब्लॉग लेखन पर केंद्रित था। यह ब्लॉग पोस्ट इस वर्कशॉप का परिणाम है।

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