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बॉयस लॉकर रूम: मर्दानगी का पैमाना.

जैसे जैसे एक व्यक्ति जन्म के बाद अपने सामाजिक माहौल से परिचित होता है तो वैसे वैसे उसकी पहचान जाति, वर्ग, काम, व्यवहार, सामाजिक मान्यताओं के अनुसार बदल जाती है । फिर चाहे वो किसी भी लैगिंक पहचान के साथ क्यों ना पैदा हुआ हो, उस व्यक्ति को अपनी सामाजिक पहचान के अनुसार कपड़े, सोच, काम-काज और व्यवहार को  उसी अनुसार करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, एक बच्चे का रोना स्वाभिक है लेकिन  सामाजिक पहचान के अनुसार रोना पुरुषों के लिए वर्जित है जब कि रोना महिलाओं के लिए वर्जित नही है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो एक व्यक्ति को एक सामाजिक सांचे में ढलने के लिए मजबूर करता है। इसी प्रकार पितृसत्ताकम सोच पुरुषों को  विशेषाधिकारों का प्रलोभन देकर एक विशेष प्रकार के सांचे में ढलने के लिए मजबूर करती है। पितृसत्ता की सोच से पैदा  हुई मर्दानगी के पैमानों पर पुरुषों को मापा जाता है। इन पैमानों पर खरा उतरने के लिए पुरुष किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। जौखिम भरे कार्यों से लेकर हिंसा तक हर पैमाने पर अव्वल आना मर्दानगी के लिये  मानो जैसै एक दूसरे नियम हो। 

मर्दानगी की दौड़ और पैमाने की हद तो तब हो गई जब इंस्टाग्राम पर 14 से 15 साल के लड़के एक ग्रुप बनाते हैं  जिसका नाम लॉकर रूम है। अगर हम इसके मतलब को समझने की कौशिक करे तो समझ मे आता है कि ऐसी जगह जहाँ कोई अपनी निजी बातें  कर सके। 14 से 15 साल के लड़के इस बॉयज लॉकर रूम में लड़कियों की तस्वीरें सांझा करके उनके साथ रेप करने की बातें किया करते थे। यह वास्तव में हमारे पूरे समाज के लिए चेतावनी है कि हमारी नई पीढ़ी किस दिशा की तरफ बढ़ रही है। इन लड़को में विषाक्त मर्दानगी का असर साफ तौर पर नज़र आ रहा है जिसका बहुत  बुरा प्रभाव हमारे समाज पर पड़ रहा है।

14 -15 साल के लड़कों के बीच  इस तरह की चर्चा का होना इस बात की चेतावनी है कि हमारा सामाजिकरण किस तरह हो रहा है। सामाजिकरण से मतलब सिर्फ परिवार से नही है बल्कि हर उस कारक से है जो इस तरफ की मानसिकता को बढ़ावा दे रही हैं। फिर चाहे हमारे रीति रिवाज हो या फिर अपराधों को सामान्य दिखाने वाला मनोरंजन जगत। कहीं  जाने अनजाने में सामाजिकरण के कारक रेप कल्चर को बढ़ावा तो नही दे रहे?  बहुत सारी फिल्मों, विज्ञापनों में जौखिम लेना, नियमों को तोड़ना, हिंसक होना आदि मर्दानगी के पैमानों की तरह पेश किए जाते हैं। इन पैमानों तक पहुँचने के लिए मर्दानगी की मानो एक रेस सी लग जाती है।  इस प्रतियोगिता में पुरूष जीत तो जाते हैं  लेकिन इसके चलते वे अपने अंदर के संवेदनशील इंसान को कई पीछे ही छोड़ आते हैं।

इस घटना पर एक पक्ष यह भी निकल कर आ रहा है कि बॉयज लॉकर रूम की सारी बातें उनकी निजी बातें है और सभी को एकान्तता का अधिकार है। लेकिन हम इस बात को नकार नही सकते कि निजी या एकान्तता का अधिकार तभी तक माना जाता है जब तक हम किसी ओर की  निजी या एकान्तता का अधिकार का उल्लंघन ना करें। बॉयज लॉकर रूम में जितनी भी बातें हो रही थी वे सारी बातें  महिलाओं के प्रति हिंसा को दर्शाती है। महिलाओं के प्रति हिंसा करना या हिंसा को बढ़ावा देना एक अपराध है। किसी लड़की या महिला के बारे में बलात्कार करने की योजना बनाना या बातें करना किसी भी लिहाज से निजी नही हो सकता। चाहे घरेलू हिंसा या फिर यौन शोषण इनमें से कोई भी घटना निजी नही है और ऐसी घटनाओं को निजी दिखा कर हम अपराध की गंभीरता को कम नही कर सकते।

ऐसे अपराधों के लिए कानून  व्यवस्था का सुचारु रूप से कार्य करते रहना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन आखिर कब तक हम सिर्फ इन समस्याओं की टहनियों को काटते रहेंगे। असल मे इन समस्याओं की जड़ पर वार करना बहुत ज़रूरी है। अगर गौर से देखा जाए तो नज़र आता है कि पितृसत्ता इस तरह के अपराधों की असली जड़ है। पितृसत्ता से पैदा हुई मर्दानगी ना केवल ऐसे विचारों को युवाओं के दिमाग मे डाल रही है बल्कि उन्हें बढ़ावा भी दे रही है। टिक टोक से लेकर फेसबुक तक, गली के नुक्कड़ से लेकर नेशनल हाईवे तक हिंसा, जौखिम, अपराधों के प्रति लगाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। भला मर्दानगी के ये कैसे पैमाने है जिनको हासिल करने के लिए पुरुष अपनी सवेंदनशील भावनाओं, प्यार और इंसानियत को हिंसा, नफ़रतों के पर्दे के पीछे छुपा लेता है? आखिर क्यों प्यार, दया, रोना, एक दूसरे की देखभाल करना मर्दानगी के पैमाने नही हो सकते? बहुत ज़रूरी है कि हम घरों, स्कूलों, दफ्तरों और सड़कों पर एक संवेदनशील पुरुष होने के उदाहरण पेश करे ताकि आने वाली पीढ़ी को मर्दानगी के पैमानों को पाने के लिए हिंसा और नफरत को हथियार ना बनाना पड़े। तभी मर्दानगी के नकली मुखोटों को छोड़कर एक संवेदनशील पुरुष सामने आएगा। आज हमें ऐसे पुरुषों की ज़रुरत है जो प्यार, दया, एक दूसरे का देखभाल जैसे भावों में विश्वास करता है। जिसे अपने आँसुओ को छुपाने के लिए  गुस्से व नफरत की ज़रुरत ना पड़े। ऐसे पुरुषों के साथ मिलकर ही हम एक सुंदर समाज का निर्माण कर सकते हैं जो बराबरी, न्यायसंगत और  गरिमा पर आधरित हो।

 

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