हर क्षेत्र में प्रगतिशील सोच, पर माहवारी के मुद्दे में पीछे क्यों ?.

माहवारी को समाज मे आम जन के बीच सामान्य बनाने और इससे जुडी शर्म को दूर करने के लिए अलग अलग तरह के प्रयास और उन सबको जागरूकता के लिए सांझा करने का दिन रहा आज। मुझे कुछ 10 साल पहले का किस्सा याद आया जब मैं एक प्रगतिशील नाटक आंदोलन और वैसी ही विचारधारा के कई संगठनों से जुड़ा था। आज महसूस हुआ कि कितनी अलग अलग तरह के प्रगतिशील विचार या कितनी सारी परतें हैं और कई बार तो इनका एक दूसरे से 36 का आंकड़ा रहता है । खास तौर पर अगर हमारे वरिष्ठ साथी या सभी साथी माहवारी या सैनिटरी पैड से जुड़े मुद्दों पर कुछ कहने पर या कुछ सवाल करने पर हमें अपराधी घोषित कर देते हैं। माहवारी पर बात करने में बेहद ऐतराज दिखाएं तो सारी प्रगतिशीलता एक ढ़कोसला लगती है। स्वयं केंद्रित प्रगतिशील विचार बड़े खतरनाक हो सकते हैं। खैर असली किस्से पर आते हैं।

आज से 10 साल पहले मैं एक नाट्य समूह का हिस्सा था। कोई छोटा आयोजन हो या बड़ा प्रबंधन, उसकी ज़िम्मेदारी मेरी होती थी। एक बार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली के साथ लगभग 40 दिन लंबी नाट्य कार्यशाला का आयोजन किया गया। हमेशा की तरह इस बार भी प्रबंधन संबंधी ज़िम्मेदारी मेरी थी। कार्यशाला के बीच मे किसी को माहवारी आई और मेरे एक वरिष्ठ साथी जो हमारे लिए प्रेरणा के स्त्रोत थे, उन्होंने मुझे कहा – जाओ कोटेक्स ले आओ। मुझे साइज और गुणवत्ता संबंधित जानकारी चाहिए थी क्योंकि मुझे भी अब तक कोई जानकारी नही थी और न ही मैंने कभी इससे पहले खरीदा था। मेरे सवाल करते ही महाशय इतना भड़क गए कि मुझे उलटा सीधा बोलने लगे। मेरे सवाल को बक़वास और मुझे अपराधी घोषित कर दिया। तभी किसी ने बीच मे आकर माहौल शान्त किया। हालाँकि मैं सैनिटरी पैड ले आया, दुकानदार ने मुझसे 30 रूपए लिए और काले पॉलीबैग में जाने क्या दिया। मेरी देखने की हिम्मत नही हुई क्योंकि पहले ही अपराध बोध से गुज़र रहा था।

मेरे मन मे कुछ सालों तक हमेशा यह सवाल चलता रहा कि मैं गलत था या वो महाशय? उसके बाद भी लगातार कई मौके आये जब उसी तथाकथित प्रगतिशील माहौल में किसी महिला साथी के साथ कही बाज़ार में मुझे दूर खड़े रहने का बोल उनको सैनिटरी पैड लेने पड़े।

तो सवाल आज ये है कि प्रगतिशील माहौल में जहाँ महिला अधिकारों को लेकर हम काम करते हैं, वहां भी ये चीज़े इतनी जटिल हैं तो आमजन इससे कितना प्रभावित होंगे। नीला रक्त दिखा कर विज्ञापन जगत भी इसी संकीर्ण मानसिकता की पैरवी करता है जिसमे चुपके से कोई लड़की अपनी मां या महिला साथी से ही अकेले में बात करती दिखती हैं। निःसंदेह बहुत जागरूकता की ज़रुरत  है हमे ताकि हम माहवारी, इससे जुडी समस्याओं और उत्पादों पर खुलकर बात कर सके, साथ ही सब महिलाओं की वर्तमान उत्पादों और अन्य वैकल्पिक उत्पादों तक पहुंच बन सके।

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